Saturday, April 19, 2014

गज़ल

कुछ वस्ल में बातें न हुईं, कभी हिज़्र के लम्हे न हुए
अजीब इश्क़ था मेरा - यादों को भी किस्से न हुए।

वो इंतेहा-ए-इश्क कि रग-रग में घुल गई इबादत
वो जुनूं-ए-यार कि कभी ख़ुदा के भी सिज्दे न हुए।

बारहा दामन से लगे तो रहे, वो क्या थे, कि न थे?
वो यादें जो तेरी न गयीं, वो ख्वाब जो मेरे न हुए।

और कैसे ख्वाब? तुम्हारी परछायिंओं से बुनते गए
न परछायिंओं को शामें, ख्वाबों के भी सवेरे न हुए।


Friday, January 3, 2014

नज़्म

सोच के एक सिरे को पकड़ा,
सोचा इक ख्याल बुनूं -
जरा हल्के रंग का,
फिर जरा गाढ़े रंग का,
और फिर किसी और रंग का,
ऐसे दस बारह रंग-बिरंगे ख्याल जमा हों
तो उन्हें जोड़  इक नज़्म बनाउं -
कुछ तुम्हारी कैफ़ियत की मानिंद।

मगर इन सूती सोचों में तो गांठें पड़ती हैं,
ज़हन बेतरतीब ख्यालों में उलझ जाता है,
इन्हें जोडूं तो तो शायद खादी की कोई नज़्म बने -
हक़ीकत की तरह खुरदरी, बेरंग।

तुम यूं करो न!
जरा हाथ फेर दो इनपर
सब सोच के धागे रेशमी हो जाएँ,
सब ख्याल रंग-बिरंगे -
रेशम में सुना है गांठें नहीं पड़तीं,
औ' मेरी कारिगरी में जो कमी रहे
तुम्हारे रंगों में छुप जाए शायद!

Tuesday, October 22, 2013

गज़ल

तुम होते तो यक़ीनन न ये हिस्से में बयाबां होते 
मगर तुम भी मेरे होते तो तारीख का हिस्सा होते। 

स्याह होने से तो क्या उम्र ख्यालों की कम होगी 
तुम होते तो जरा रंग अशआर में जियादा होते।  

हमको तो रास आ गयीं गुमनामियां तुम्हारे बाद 
तुम भी तो अब इस भीड़ से जियादा कहां होगे? 

हमने तो अपनी इबादतों में ढूंढ़ लिया खुदको 
गर सुनते मेरी फ़रियाद, तुम भी तो खुदा होते। 


Wednesday, July 3, 2013

गज़ल

घुलीं जो सांस में, सांसों की वो कीमतें लगा गयीं
फिर हर्फ़-हर्फ़ उदासियां पूरी गज़ल पे छा गयीं।

हर बात सुनी सी है मगर, बेनाम सी आवाज़ है
किस गुमां में हमपर फ़िज़ा ये तोह्मतें लगा गई।

क्या खूब हमने जाना तुझे-ऐ इश्क़, तेरी जुस्तजू
संभले थे तो गिरा गई, गिरे तो फिर से उठा गई।

बस एक सूरत-ए-हाल पे तूं मत हमें बर्बाद कह
थीं बर्बादियां कि फिर हमें मुरीद खुद का बना गयीं।





Sunday, June 30, 2013

शायर की मौत

कैसी-कैसी बातें करता 
किस उलझन में जीता-मरता
हाथ बढाकर चांद खुरचता 
रंग सुनहले-ख्वाब वो गढ़ता। 

सहर से मांग लूं किरणें थोड़ी 
मिला पानी कुछ गूंथ लूं मिट्टी 
फिर लेप चांद के दाग मिटा दूं
जितना खुरचा उतना लौटा दूं। 

एक रोज कुछ भूल से उनसे 
दे बातों में तूल कि उनसे 
"तेरी आंखों से" - कह बैठा -
"सूरज जलता, चांद चमकता"। 

फिर ऐसा है चांद से नज़रें 
फेर के जाने वो बैठे हैं 
ड़ाल हक़ीकत के परदे 
ढ़क कर सहर को बैठे हैं। 

"एक कच्चा-पक्का शायर
कुछ आखिरी सांसों का मोह्ताज़ है तबसे"  


Thursday, June 13, 2013

गज़ल

अबके शायर को जरा जिंदगी की दवा दे मौला
हां ठीक कह्ता हूं अब ये हस्ती ही मिटा दे मौला।

रेशा-रेशा जल रहे हैं जान-ओ-दिल कब से कहूँ
ये खामखा की लौ - दे फूंक अब बुझा दे मौला।

ये जलती हुई आंखें, ये कश्मकश, ये ख्वाब न दे
अबके रात ढले तो गहरी नींद बस सुला दे मौला।

अब ये नज्में औ' न गज़लें औ' न ये जज्बात ही
अबके जिन्दा रख हमें तो दिल भी दुनिया सा दे मौला। 

Sunday, June 9, 2013

एक पुराना एहसास

इक ख्वाब जैसा फिर कोइ आने को है ....

जैसे खिड़कियों पर जाले लगे हों
धुआंधार बारिश से सहेजी हुई कुछ बूंदें
टिप-टिप टपकती हों,
और उनसे भी परे
कुछ झाड़ियां, कुछ अलसाए हुए बुढ़े से मकान
और एक बेतरतीब भीगा हुआ शहर;
सब एक धुन्धली तस्वीर के मानिंद आंखों के आगे पसरे हों।

और ये नादान मासूम आंखें
जाने कौन सी खूबसुरती तलाश लेंगी उनमें।

फिर ख्वाब टूटेगा,
अश्कों से बोझिल आंखें
चंद धुन्धली सी दिखती चीजों में पुराने एहसास तलाश
थक के सो जएँगी फिर।

हमने मासूमियत नहीं खोई
हमारा शहर खो गया है कहीं।