Saturday, February 9, 2013

गज़ल!

न बस ज़ज्बात, इक फल्सफा सी तेरी सोह्बत है हमें
तेरी शोखियों से ज्यादा तेरी हस्ती से मोहब्बत है हमें।

बहुत होंगे कि तेरे अन्दाज पे वफा चाहने वाले तुझसे
तेरी नज़ाकत से अजीज मगर तेरी बगावत है हमें।

मुमकिन है किसी रोज वो खुदा भी कह दें तुमको
जो है तुझसे, इंसान की इन्सां से अकीदत है हमें।

औ' तेरे इश्क में हो जाएं फ़रिश्ता, ये इम्कां भी नहीं
हाँ मगर तुझसे सुलझी सी, मुमकिन सी चाहत है हमें।


Tuesday, February 5, 2013

बात

आ कि फिर जिन्दगी की बात करें
खालिस जिन्दगी - भूखी, अधनंगी।

तारीकियां जो पिघलने लगी  हैं
नर्म ख्वाबों के नादां उजालों में
सहेज लो उनको -
काली स्याही में मिला उनसे
गाढ़े रंग की हकीकत लिखी जाएगी।

जुबां पर जो कड़वा जायका है
इश्क की खामखा मिठास से फीका पड़ने लगा है
बचा लो उसको -
बेबाकियत मीठी पड गयी
तो अल्फाज़ असर खो देंगे।





Saturday, January 19, 2013

सुन बावरी!

सुन बावरी!
सब एक हैं - ये धूप भी और छांह भी
इस भेद का ये भेद है
जो है खुशी सो खेद है
जो है हंसी सो आह भी।

सुन बावरी!
इस खेल की ये रीत है
ये रंग सब खो जाएंगे
तब एक रंग हो जाएंगे
सब जीत भी और हार भी।

सुन बावरी!
अब छूट जाने दे हमें
तेरी राह के हैं मिथक भर
अब टूट जाने दे हमें
ले नफरतें और प्यार भी।

सुन बावरी .....

Tuesday, December 11, 2012

गज़ल

बाद मुद्दत के इक खयाल फिर अपना लगा
जाने क्यों उदास होना भी आज अच्छा लगा।

ज़हन रु-ब-रु नाकामियों से परेशान होता था
दिल खामखा कुछ जिन्दा लगा, ताजा लगा।


तेरे एहसास की बारीकियाँ क्या समझा किए
जब टूट गया तब अनमोल तेरा वादा लगा।

तूने बख्शी है इक उम्र तसल्ली दिल को
बाद रूख्सत के कोइ नेमत तेरा आना लगा।

तूं 'अक्स' की इन गज़लों का मतलब न पूछ
तुझसे लगा, जब भी अशआर का मज़मा लगा।






  

Friday, November 16, 2012

ग़ज़ल


हमारे बस सफ़र से ही क़ायदे कुछ भंग होते हैं 
यहाँ पर हर कदम रस्ते जरा और तंग होते हैं। 

सियासी मसलों पे इस कदर न बेबाक हुआ कर 
दर्मयाँ अंधेरों-उजालों के यहाँ कई रंग होते हैं।

यहाँ सब फासले बस मंच की रवायतें भर हैं
हो नेपथ्य तो सब एक दूसरे के संग होते हैं। 

दरवाजों के सुरों से ही क्यूँ तूं बावरा है 'अक्स'
इस घर में दीवारों के भी अपने आहंग होते हैं। 

Friday, October 19, 2012

गज़ल

यूं बेकरारियां बज्मों में सरेआम सबसे कहा  न कर
तूं  तो मेरी अपनी है गज़ल, तूं  तो हमें रुस्वा न कर।

इस अंदाज पर सब तेरे कायल तो हो जाएंगे मगर
आ कहेंगे मुझसे फिर कि बातें तूं ऐसी किया न कर।

ये लोग कब समझेंगे भला तेरे दर्द की बारीकियाँ
रौशनी के पुतलों पे अपनी तारीकियाँ ज़ाया न कर।

जिसे भी ज़ख्म दिखाओ उसी को चारागरी का शौक नहीं
दुआ ही कर जालिम,  तूं बेशक भले दवा न कर।



Wednesday, September 26, 2012

गज़ल

अल्फाज़ जोड़ रखूं मगर, कुछ हाल-ए-दिल बयां तो हो
कहो तो फिर गज़ल कहूँ, पर कहूँ तो कुछ नया तो हो।

ज़हीन  तो  क्या  खाक  थे,  शायर  भी  अब कहाँ रहे
जो  महफिलों  में  हम कहें, जो कुछ न हो खरा तो हो।


हकीकतों  में तुम  तो  अब खबर हमारी लोगे क्या
इक ख्वाब छोड़ जाओ बस, साँसों को कुछ वजह तो हो।

ज़माने से तो लड़ भी लें, पर दोस्त तेरी खामशी?
खुशी से जो न मिल सको, कुछ रु-ब-रु गिला तो हो।

जिन्दगी तो 'अक्स' अब, बिगाड़ तेरा लेगी क्या
लुटे जो कुछ जमा भी हो, मिटे जो कुछ रहा तो हो।