Tuesday, April 17, 2012

गज़ल

ये मुकद्दर, ये हालात, यूं तंगहाल कहाँ जाएंगे 
न सिम्त ठिकाने, न रस्ते ही ख्याल, कहाँ जाएंगे.

कहो तो तुम्हारे दर पे माथा टेक आएँ हम भी
इस बार मेरे मौला जरा सम्भाल, कहाँ जाएंगे.

पिछ्ले ही बरस चौखट तक चला आया था पानी
क्या जाने बरसात में इस साल कहाँ जाएंगे.

इस फिक्रमंदी में वो अन्दाज-ए-बयां लाऊँ कैसे
चांद के ख्वाब से रोटी के सवाल कहाँ जाएंगे?

इस कशमकश से तूं अभी थका भी तो नहीं 'अक्स'
जब तलक है अपनी उम्र उठ्ने दे बवाल कहाँ जाएंगे.






Tuesday, April 10, 2012

गज़ल

गोया खोने लगी है असर तेरी हाला मेरे साकी
इस दामन में अब दर्द नहीं छुपता मेरे साकी.


सोचा था दोयम है, ये गज़ल छुपा ही रक्खूं
मगर होता नहीं जब्त गम-ए-दौरां मेरे साकी.

थक कर भी लड़खडाए तो बदनाम हो गए
क्या खूब निभा रही है हमसे दुनिया मेरे साकी.


दिल टूटने का सबब तक न पाला किए कभी 
यूं मिट रहे हैं हम भी खामखा मेरे साकी.











Friday, February 24, 2012

गज़ल

ये जो तेरे हर मोड़ पर जिंदा अफसाने मिल जाते हैं
दो कदम चल दो तो दो लोग पह्चाने मिल जाते हैं|

हैरां हूँ हर शै को है इतनी  पहचान मेरी कैसे
हैरां हूँ हर बात में कैसे अशआर पुराने मिल जाते हैं। 

है किसे शौक, जाए कौन इस आबो-हवा को छोड़ कर
क्या करुं इन्सां हूँ, कुछ रस्म निभाने मिल जाते हैं|

वो एक शहर है, तूं वहाँ खो ही तो जाएगा 'अक्स'
यहाँ तो अब भी हर सिम्त यारों के ठिकाने मिल जाते हैं।







Monday, February 20, 2012

गज़ल

जो कह ही चुके हैं सब बातें तमाम लिखते तो क्या लिखते
खामखा राह के पत्थर को मुकाम लिखते तो क्या लिखते।

यूं ठीक कि किसी रोज तो तेरे हाथ रुस्वा भी हुए हम
तूं फिर भी प्यादा है, तुझको निजाम लिखते तो क्या लिखते।

कल देख तो आए थे सियासत भी उसकी नुमायिश भी मगर
तोहमतें तो थीं हम पर भी  तमाम लिखते तो क्या लिखते।


यूं ठीक कहते हो गज़ल का एहसास भी छिन गया हमसे
दोपहर की छांव को मगर शाम लिखते तो क्या लिखते।

गुरुर हमको भी कम नहीं है अपनी अहमियत का 'अक्स'
फिर भी मजबूरियों को एह्तराम लिखते तो क्या लिखते।


Tuesday, January 10, 2012

गज़ल

हम  अब और नहीं वो, ऐ खल्क़त-ए-शहर हमें याद न कर
तुझे जिसका भरम है, कोई और था शायर हमें याद न कर.

इस खाक के दम पर क्या तुझसे अदावत भी करें हम
मिट ही जाने को हैं, अब और सितमगर हमें याद न कर.

कुतरे  हुए  पंखों से  क्यूं परवाज़  की  उम्मीद है साथी
बिखरे हुए इरादों से कहाँ होता है  सफर, हमें याद न कर.

तेरी बज्मों मे खामखा मेरा नाम उठे मुनासिब तो नहीं
तूं शम्मा-ए-शब् है, हम चिराग-ए-सहर हमें याद न कर.

वो और ज़माने थे कि बज्मों की रौनक था 'अक्स'
अब तो इस ज़ानिब फक़त दर्दों के हैं मंज़र, हमें याद न कर.




Sunday, December 18, 2011

गज़ल


हमारे लफ्जों में ढला है वो, खुदा की नेमत में नहीं 
हमारी आखों से बना है, आइने की सोह्बत में नहीं|

उसको यकिनन खुदा ने फुर्सत में तराशा होगा
हम भी खुदा के इरादों में ढले हैं, गर फुर्सत में नहीं|

यूं उसके गुरुर के कायल तो हम भी हैं मगर 
शोख अदाओं में है बात, दर्मयाँ सियासत में नहीं|

वो किसी रोज तो तुझे फरिश्ता भी कह देंगे 'अक्स'
रोजमर्रा की ये बात मगर फिर भी कयामत में नहीं|

Wednesday, December 14, 2011

गज़ल

जो कुछ नहीं है जिन्दगी में, ये फुसूं भी है
जरा नाकामियों से फिक्र है, जरा शुकूं भी है|

आवरगी बढ़ गई कुछ इस कदर कि आजकल
हंसी को ये खबर नहीं, अश्क रु-ब-रु भी है|

जब भी पी के कह गए, लोग हंस के रह गए
बदनाम आदतें हैं जो, अपनी आबरू भी हैं|

अपनी आदतों से वो खफा-खफा सा है मगर
उससे तल्खियाँ हैं, वो मुझसा हु-ब-हू भी है|

करते परवा तो कबके खाक हो जाते 'अक्स'
मिटे जहाँ-जहाँ सफर, तखलीक जुस्तजू भी है|