Wednesday, May 18, 2011

हजारों ख्वाहिशें ऐसी....

हजारों ख्वाहिशें ऐसी..

एक शख्श से लिपटी हुई कई शख्सियतें
एक पोटली में बाँधी हुई कितनी नाकाम हस्रतें
कुछ रूह की चाहत, कुछ उम्र के तकाजे..
यकीनन टूट कर बिखर जाने, न मिलने वाली
हजारों ख्वाहिशें ऐसी..

मौजों में बलखातीं
किनारों से टकरातीं, बिखर जातीं
धड्कनों में आवाज पातीं
सासों मे घुल खामोश खो जातीं 
हजारों ख्वाहिशें ऐसी...

ये आम और खास के फर्क
ये दिल के ज़ज्बे, ये पेट के मुद्दे 
ये ज़र्द होते चेहरे की हंसी में कभी-कभी मिलने वाले 
कभी न पूरे होने वाले इरादों की
हजारों ख्वाहिशें ऐसी..

किसी गालिब के खयालों में जन्म पातीं
किसी जालिम दुनिया के इशारों से 
खौफ खातीं, सहम जातीं 
हजारों ख्वाहिशें ऐसी....


Wednesday, April 20, 2011

गज़ल

जिन्दगी तेरा काफिला हमें 
ये ले के आया है कहाँ हमें.

क्यूं जल रही हैं ये बस्तियाँ 
क्यूं डरा रहा है  धुआं हमें.  

ये वक्त कैसे रुक गया 
जरा हाथ थाम औ' चला हमें 

अब झूठ-मूठ दिलासे न दे 
हो चला है सबकुछ पता हमें.

आखिर में वो भी कह गया 
"न पुकारा करो खुदा हमें"

रहने दो अपनी पहचान गुम
यहाँ रहने दो नाआशना हमें 




Sunday, April 17, 2011

गज़ल

एक  दुनिया  है कि  ख्वाबों मे  जवां  होती है 
एक हकीकत है जो मुश्किल से बयां होती है . 

वो जो  कहते हैं कि शायर है, बडा कबिल है 
दिल-ए-नाशाद को ये  तारीफ सजा होती है. 

तेरी दुनिया के तरीके सीखें भी कहाँ से साकी 
तेरी बज्मों में बस अमीरों से वफा होती है.

दिल तो नादां है, उड़ने की ख्वाहिश करता है 
खौफ होता है कि ज़मीं पैरों से जुदा होती है.

हसरतों के पाँव छिल गए दर-ब-दर फिरते
इस शहर मे सुना था गरीबी की दवा होती है. 








Thursday, March 17, 2011

गज़ल

सुनेंगे फसाने तो इश्क का अन्जाम भी मांगेंगे
लोग  मेरी  नज्मों  से  तेरा  नाम  भी  मांगेंगे. 

कहते तो हो कुछ और हसीं गज़लें भी लिखूं
उन जुल्फों की बात उठी तो वो शाम भी मांगेंगे.

लड़खडा के गुजरुंगा अपने शहर से कभी फिर 
दोस्त पुराने, मेरे नशे से तेरा जाम भी मांगेंगे.

जुड़ा तेरे नाम से किसी का नाम भी तो होगा 
सुनने  वाले  पुरानी तेरी पहचान भी मांगेंगे.

तेरे ख्यालों पे भी हक अब जताउं तो कैसे
हिसाब तो लोग महफिल में सरेआम भी मांगेंगे.   


Tuesday, March 8, 2011

गज़ल

आजकल क्या  है  कि बात  कुछ बताई नहीं जाती
लब पे आती है जो आह, लफ्जों में लाई नहीं जाती.

कल तलक हुनर मे ढाला हुआ इक शौक था दर्द 
अब  ये  आदत  कुछ  हमसे निभाई नहीं जाती.

लग गया है होश किसी बददुआ की तरह साकी 
जाम की ओट में भी इल्म की परछाई नहीं जाती.

हर शै तेरा असर भी खोता जाता है लम्हा-लम्हा 
तेरे कूचे से गुजर कर भी अब तन्हाई नहीं जाती.

ये  गुरुर,  ये  रुतबा,  ये  ठेंगे  पे  मुकद्दर 
आलम-ए-गर्दिश में भी ये जौक-ए-खुदाई नहीं जाती.  









Monday, February 28, 2011

गीत

सुन मन्द-मन्द उठता है राग 
हकीकत मे जैसे घुल जाए ख्वाब
अब किस जोगी का तोडे विराग 
तेरा शृंगार!

कितना अहं, कितनी है साख 
हैं मौन छंद, कविता आवाक
किसको न तेज से कर जाए राख 
तेरा शृंगार!

जो खुले केश तो उठे बयार
जो उठें पलकें छा जाए बहार
जाने किसके अब जगाए भाग 
तेरा शृंगार!   


Monday, February 21, 2011

गज़ल


चंद  लम्हों  को  यूं  खो  तो गए हैं हम 
कौन कह्ता है इस शहर में नए हैं हम.


छिले हुए घुटने और लिपटी हुई मिट्टी
मुद्दत से गर्दिशों के लाडले हैं हम 

कितनी थकी हारी शामें भी याद  हैं 
कितनी सुबहों को फिर चल पडे हैं हम 

हमें मिट जाने का खौफ न दो दुनिया 
खाक की सोह्बत में तो पले हैं हम 

अपनी तह्जीब कि नजरें झुका रक्खी हरदम  
यूं  जालीम  तुझसे  कब  डरे  हैं हम