Saturday, March 20, 2010

ग़ज़ल

वो दोस्ती, वो साथ, वो गुफ्तगू तो नहीं
लाख कह लें मगर ज़िन्दगी हु-ब-हू तो नहीं।

माना कि छूट जाने का इलज़ाम है हमपर
जो निकल गया है आगे वो भी तूं तो नहीं।

तेरा भी एहसान है कि जरा इन्सान हैं हम
तुझसे इन रंजिशों कि हमें आरजू तो नहीं।

तेरी यादों को मुस्कुराहटों में टाल देते हैं
ज़िन्दगी को तेरी कमी न हो, यूँ तो नहीं।

Wednesday, March 3, 2010

तब और अब

गली के नुक्कड़ की जिनसे यारी रही
वो अब भी ताजे हैं दिल के किसी कोने में
सदियाँ गुज़रीं कि उनको देखा हो
मगर वो भूलते नहीं।
किसी के धक्के से बचपन में जो धूल होठों से लगी
अब भी चिपकी है,
जिंदगी को उनकी मासूम दोस्ती का जायका अब भी याद है।
जब वादों का मतलब भी न जानते थे
तब का उनसे दिलों का वादा है।
कुछ और भी थे,
जो कहीं किसी लेक्चर, किसी कैंटीन, किसी जलसे में मिले थे
कई बार निगाहों के सामने से गुज़रे,
दिल ने गवाही ही नहीं दी कि वही हैं
बस हाथ हिला के गुज़र गए।
हालांकि वादा किया था उन्होंने भी बिछड़ते वक़्त
कि ई-मेल करेंगे, अपना नंबर जरुर भेज देना....

Sunday, February 21, 2010

प्लास्टिक की थैलियाँ

मोहल्ले के बाजु में कुछ खेत हैं
लोग कहते हैं वहां धान उगा करता था कभी।
मेरे बचपन में वहां क्रिकेट के मैदान थे
सिवाए बरसात के, जब पानी भर जाता था
बच्चे कागज़ की नावें तैराते थे उनमें।
अच्छी बनी नावें कभी-कभी बड़ी दूर निकल जाती थीं
उम्मीद होती थी की कोई लहर किसी रोज वापस खींच लाएगी उन्हें।
इसबार देखा तो शहर बड़ी तरक्की कर गया सा लगा
बच्चों को कागज़ की नावें बनानी नहीं आतीं
बारिस का पानी खेतों के बजाये रास्तों पर जमने लगा है
और घरों के दरम्यान जो खेत बचे हैं
उनमें प्लास्टिक की थैलियाँ तैरती हैं अब
कागज़ की नावें तो उलझ कर डूब जाएँ उनमें
अब उम्मीद नहीं रही
कोई लहर अब मेरी अच्छी नावों को कभी भी वापस नहीं ला पायेगी.....

Friday, January 29, 2010

सियासत

ये जम्हूरियत के जश्न औ' ये ग़ुलाम जिंदगी
अब भी तो वही किस्से हैं तेरे नाम जिंदगी!
अब भी तो लिए जाते हैं बंद कमरों में फैसले
अब भी तो वही हाकिम वो निजाम जिंदगी!
बड़ी चर्चे हैं कि देखो ये दुनिया बदल गयी
हमको तो वही खुदा औ' वही राम जिंदगी!
दिल्ली में सुना है सड़कें भी चमकने लगी हैं अब
यहाँ महीनों से अँधेरा है शहर तमाम जिंदगी!
मैले दिलों ने कुछ रोज़ हुए खद्दर पहन लिए
जैसे शेर कि खाल ओढे हुए सियार जिंदगी!
वो रोज़ कहते हैं कि हुकूमत हमारी हो गयी
अब भी तो वही कहते हैं सुनती है आवाम जिंदगी!

Sunday, January 24, 2010

मेरी दुनिया..

कैसी उलझन, क्या-क्या लोग, कितनी बातें मेरी दुनिया

तेरी हरेक शै पर बिछीं कितनी बिसातें मेरी दुनिया।

कितनी सदियाँ अपने अश्कों से तेरे घर के दीप जले

कितनी सदियाँ हमने आखों में काटी रातें मेरी दुनिया।

तेरे मेरे रिश्ते में ये खेल अजब क्यूँ होता है

तुझपर बहार आती, होतीं जब अपनी बरसातें मेरी दुनिया।

अपना तो फिर भी है क्या, हम तो जनम के जोगी ठहरे

तेरे अपनों को ही भारी तेरी सौगातें मेरी दुनिया।

Tuesday, January 5, 2010

ग़ज़ल

आ कि वो लम्हें, वही दिल-ए-बेक़रार आये

आ कि वही शामें, वो तेरा इंतज़ार आये।

आ कि ये दुनिया, ये सियासत न याद आये

आ कि ये घातें, ये बिसातें न याद आये।

आ कि बड़ी मुद्दत से बड़ी बेसबब हूँ मैं

आ कि तूं आये तो ज़रा जीने कि वजह आये।

आ कि मेरा हक जो नहीं, गुजारिश ही समझ ले

आ कि तूं आये तो मुझे मेरी भी याद आये।

आ कि बड़ी दिल में भरे रंज-ओ-ग़म हैं जानां

आ कि तूं आये तो ज़रा इत्मिनान आये।

Friday, December 18, 2009

तुम अगर आओ कभी....

तुम अगर आओ कभी.....
नैनों में वो दीप्त छवि
बसा ही लूँ, जाने न दूँ
तुम अगर आओ कभी।
आ जाएँ मृत वीणा में प्राण
जो छेड़े बांसुरी कोई और तान
गाने न दूँ
तुम अगर गाओ कभी।
सांवरी...
जलते दिवस की छाँव री
मैं नील गगन पर कोई और रंग आने न दूँ
तुम जो मेघा बन छाओ कभी।
तुम अगर आओ कभी............