Thursday, July 30, 2009

भूली हुई यादें.....

वादे तो टूट गए, रिश्ता है टूटता ही नहीं

जो हमें छोड़ गया, हमसे छूटता ही नहीं।

लब तरसते हैं अदद इक नाम की खातिर

अपने पाले में अब तूँ भी नहीं, खुदा भी नहीं।

इन गलियों से पूछो मेरे घर तक ले जाएँगी हमें?

घर जो याद आता भी नहीं, घर जो कभी भुला भी नहीं।

देख पाता तो नहीं, दोस्तों के कहकहे सुनाई देते हैं

शहर यूँ पराया तो नहीं, अब आशना भी नहीं।

कोई बता दे, क्या अब भी शाम आती है यहाँ?

यूँ मुद्दत से तेरी जुल्फों का साया भी नहीं।

Wednesday, June 17, 2009

रिश्ता

कुछ सीधी सच्ची बातें बता दे
इतनी साधारण रुनझुन में
बात थी क्या
कि होश रहे गुम?
तेरी पायल से क्या रिश्ता है भावों का?
किसी रोज़ मेरी उलझन सुलझा दे...
कितनी साधारण बातें!
उनमें क्या मुद्दे थे
इतनी भी चिंतन के?
तेरी बातों से क्या रिश्ता है दर्शन का?
किसी रोज़ जरा ये राज़ बता दे...
आंसू जो जमे
आँखें पत्थर सी हो चली हैं जानम
एक से दिन रात
जैसे सारे खो गए हों मौसम।
तेरी यादों से कुछ रिश्ता है सावन का
इकबार जरा फ़िर से रुला दे....

Sunday, January 25, 2009

सवाल

"मेरा मुल्क रुकता नहीं,
दहशत की ज़द जिस्म तक है,
रूहें आजाद हैं हमारी!
ख्वाब बड़ी सख्त-जां हैं हमारे,
औ आँखें बड़ी जीवट वाली,
ख्वाबों को ढलकने नहीं देतीं आसुओं के साथ।"
बात अच्छी है, कह लो! जश्न का मौसम है।
ये सवाल मगर बारहा ख्वाबों के साथ पल रहा है;
यहाँ जिंदगी सियासत से इतनी सस्ती क्यूँ है?
क्या कुचले हुए जिस्मों का रूहों पर कुछ भी असर नहीं होता?

Monday, January 19, 2009

पन्ने......

जिंदगी की किताब के कुछ पन्ने..........
पंखे की हवा से
या कभी खिड़की खुली रह जाए तो
अक्सर फडफडा के मेरे सामने आ जाते हैं।
आजकल जाने क्यूँ उन्हें देख बड़ी खटका सा होता है........
वक्त मुझसे छूट गया औ' मैं वक्त से।
यादों के पन्नों पर पेपरवेट भी नही रखा जाता।
बड़ी कशमकश में हूँ
सोचता हूँ कुछ पन्ने फाड़ ही डालूं अब
कुछ यादें मेरे जेहन की दीवारों में साँस नही ले पातीं
ज़ज्बातों की जकड़न से
कुछ रिश्तों का दम घुटने लगा है
अब इनके काबिल नहीं रहा मैं.........

किताब से फाड़े हुए पन्ने
अक्सर सिलाई उधेड़ कर ही निकलते हैं मगर.............

Saturday, January 17, 2009

बनाम साकी........

ये जुस्तजू, ये गर्दिशें, ये हालात क्या जाने
ये बेबसी, ये जिंदगी, ये जज्बात क्या जाने?

खुदा करे, हर जंग तेरी, जीत से हो रु-ब-रु
तूँ साजिशें, ये बाजियाँ, ये शह औ मात क्या जाने?

तेरे दम से सारी रात जगा था मैकदा साकी!
कहीं हम ने रो रो के गुजारी है रात क्या जाने?

तेरी बज्म में जगह पा गए सब अपने भी, पराये भी
तुझे देख कर भी हलक तक रह गई बात क्या जाने?

चल अच्छा ही हुआ शहर में कोई आशना न रहा
बहुत होता था भरम हमीं को देता है कोई हाथ क्या जाने?

Monday, December 8, 2008

चंद शेर

निगाहों को कोई चीज यहाँ आशना न रही
गफलत है हमें, या शहर में वो फिजां न रही?
दिल से निकली हुई हर बात ने इतने मतलब देखे,
ज़बां को कुछ और कहने की तमन्ना न रही।



वीरानी सी गलियों में सुहाना कोई मंजर आए
कोई शाम तेरी जुल्फों से गुजरती फ़िर इधर आए
तेरे जाने से खो गए हैं शहर के सब ठिकाने
फ़िर किसी रस्ते से गुजरूँ कि तेरा घर आए।



मुकद्दर था कि ठहरे जरा दस्तूर था कि चल दिए
ये कारवां ए वक्त है ये जिंदगी के काफिले,
आदमी तेरी किस्मत कि ये फितरत बड़ी अजीब है
जो दास्ताँ ए वस्ल है, है हिज्र के ही वास्ते।




जिंदगी किसी मौज़ का बहता हुआ पानी है
यहाँ पर वक्त और हालात कुछ रोज़ में बदल जाते हैं,
इस ग़म को तुन पलेगा आख़िर कब तलक शायर?
सब रिश्ते, सब ज़ज्बात, कुछ रोज़ में बदल जाते हैं।

शाहकार

साँझ के ढलते हुए सूरज सी मद्धम
हौले मुस्कुरातीं
जैसे लाज ने बाँध रक्खी हो हँसी,
जैसे दिल में समेत रक्खा हो ग़म।
चेहरे पर छाई एक शायराना खामोशी
फितरत में शामिल
मुसव्विर की तन्हाई।
तौबा........
जिसने भी तराशी
बड़ी खूब तराशी,
उन नूरी निगाहों में
खुशरंग उदासी...........