Wednesday, November 16, 2011

गज़ल

ये चमन, फिजा, दिन-रात, ये शाम-सबेरा कोई नहीं 
आशना हैं सब मगर इस शहर में तेरा कोई नहीं 

इसी रस्ते से हर रात गुजरता है बना वो बन्जारा 
चांद कि खातिर आसमान पर रैन-बसेरा कोई नहीं

जाने मेरी हर महफिल में नाम तेरा आ ही जाता है 
इन नज्मों में कई बरसों से ज़िक्र तो तेरा कोई नहीं









Friday, November 11, 2011

गज़ल

ये बेपनाह आवारगी कभी खल जाती है तो गज़ल कह्ता हूँ
शौक ही शौक में जान पे बन आती  है तो  गज़ल  कह्ता हूँ.

वो जिसे होश कहते हैं, मशरूफ जिन्दगी की बेहोशियाँ हैं
फुर्सत जो कभी  मैकदे में लाती है तो गज़ल कह्ता हूँ .

वो जो मैं था, हो के खाक बिखर गया था तेरे शहर में
हवा ये तुझसे  आखिरी रब्त भी उड़ाती है तो गज़ल कह्ता हूँ

दर्द एक ख्याल है, 'शायरी' कोई शौक का सामां तुझको
तूं न समझेगा, आह कोई दब जाती है तो गज़ल कह्ता हूँ.






Friday, November 4, 2011

गज़ल

पूछ्ता है कि मेरी राहों में क्यूं  मैकदा ही नहीं होता 
साकी समझता नहीं अब हमें  नशा भी नहीं होता.

होश फख्ता हैं जिन्दगी से ही कुछ इस कदर
वो होश गुम होने का अब वाकया भी नहीं होता 

किसी अपने से शौक से दो बात  कर लें कभी 
आजकल  फुर्सतों का इतना दायरा भी नहीं होता. 

हमने कुछ शौक से पाली हैं ये खामोशियाँ 
यूं कह जाने से दर्द कुछ हल्का भी नहीं होता.

हमसे अब और हुनर की उम्मीद न पाल 'अक्स'
हाल-ए-दिल और लफ्ज़ों मे तर्जुमां भी नहीं होता








Monday, October 31, 2011

बोल कि लब आजाद हैं तेरे

ये खामशी उनका खौफ़ नहीं 
तेरी इन्सानियत है..
तूं कि जिसकी चुप्पी के चर्चे हैं आजकल 
तूं मजबूर नहीं है, ज़हीन है 
यूं तेरी आवाज से सिंहासन अब भी हिल जाएंगे 
ये मुल्क उनकी मिल्कियत नहीं 
अब भी तेरी जम्हूरियत है
बोल कि आखिरी बात तेरी है 
तेरे हैं अन्तिम फैसले 
बोल जुबां अब तक तेरी है 
बोल कि लब आजाद हैं तेरे..

*'फैज़' कि नज़्म 'बोल' से प्रेरित 


Sunday, September 11, 2011

गज़ल

आवारा लफ्जों को फुसलाने, नज्में बनाने वाले
अब कहाँ लोग वो,  दर्दों  के  नाज  उठाने वाले 

दिल की सतहों उठती है, जो बात बयां होती है
सबकी नजरों छुपा रक्खे हैं वो दर्द पुराने वाले

नब्ज़ देखी है, अभी जिन्दा हूँ, धडकनें बाकी हैं
रुक के सजदे क्यूं करते हैं यूं मशरुफ ज़माने वाले

शौक अच्छा है, तुम भी सिख गए वादों का हुनर 
यूं इस बज्म मे आते हैं सब लौट के जाने वाले

जी में आया तो खुश्क मौसम से कारिगरी कर ली
मुझसे ही नकली हैं ये फूल इस डाल पे आने वाले.

Sunday, September 4, 2011

क्या आप कांग्रेसी हो?


एक साहब स्वभाव से थोड़े रुखड़े थे 
सुबह-सुबह अपने बकरे पर उखड़े थे..
मैने पूछा - "क्या हुआ?"
वो बोले - "क्या बताएँ साहब!
चार महीने से सीखा रहा हूँ
पूरा मुंह खोल - मैडम-मैडम बोल.
मुंह  पूरा खोलता ही नहीं 
मैं-मैं बोलता है, 'डम' बोलता ही नहीं!"
मैने कहा - "देशी है, हिन्दी बोलता है, अंग्रेजी क्यूं सिखलाते हो?"
वो बोले - " क्या फरक पड़ता है देशी हो, विदेशी हो?"
मैने पूछा - "क्या आप कांग्रेसी हो?"

एक साहब साहब सुबह-सुबह चिल्ला रहे थे
पानी न आने की वजह से झल्ला रहे थे
इसके पीछे आर एस एस का हाथ बतला रहे थे 
मैने कहा - "भाई ऐसे कामों मे साथ तो आपका ही होता है,
मुद्दा जो भी हो आमतौर पर 'हाथ' तो आपका ही होता है." 
साहब भडक कर बोले - "तुम कौन हो?
सी बी आइ लगवा दूंगा, बोलते कुछ बेसी हो"
मैने पुछा - "क्या आप कांग्रेसी हो?"

Sunday, August 14, 2011

गज़ल

फिर वही जलसे, वो हुज़ूम, वही हाकिमों के करतब हैं
हम फिर कुछ और नाचीज़, वो कुछ और हमारे रब हैं

खुद  को  इंसाँ  कहते है तो  जीभ  कट  सी  जाती है
हमारे  चूल्हों  के  मुद्दे  भी  उनकी दावतों के सबब हैं

हमसे और हाल-ए-जम्हुरियत न पूछ मेरे दोस्त 
दिल्ली  में  होते  आजकल  बस  गूंगे  तलब  हैं