Monday, October 31, 2011

बोल कि लब आजाद हैं तेरे

ये खामशी उनका खौफ़ नहीं 
तेरी इन्सानियत है..
तूं कि जिसकी चुप्पी के चर्चे हैं आजकल 
तूं मजबूर नहीं है, ज़हीन है 
यूं तेरी आवाज से सिंहासन अब भी हिल जाएंगे 
ये मुल्क उनकी मिल्कियत नहीं 
अब भी तेरी जम्हूरियत है
बोल कि आखिरी बात तेरी है 
तेरे हैं अन्तिम फैसले 
बोल जुबां अब तक तेरी है 
बोल कि लब आजाद हैं तेरे..

*'फैज़' कि नज़्म 'बोल' से प्रेरित 


Sunday, September 11, 2011

गज़ल

आवारा लफ्जों को फुसलाने, नज्में बनाने वाले
अब कहाँ लोग वो,  दर्दों  के  नाज  उठाने वाले 

दिल की सतहों उठती है, जो बात बयां होती है
सबकी नजरों छुपा रक्खे हैं वो दर्द पुराने वाले

नब्ज़ देखी है, अभी जिन्दा हूँ, धडकनें बाकी हैं
रुक के सजदे क्यूं करते हैं यूं मशरुफ ज़माने वाले

शौक अच्छा है, तुम भी सिख गए वादों का हुनर 
यूं इस बज्म मे आते हैं सब लौट के जाने वाले

जी में आया तो खुश्क मौसम से कारिगरी कर ली
मुझसे ही नकली हैं ये फूल इस डाल पे आने वाले.

Sunday, September 4, 2011

क्या आप कांग्रेसी हो?


एक साहब स्वभाव से थोड़े रुखड़े थे 
सुबह-सुबह अपने बकरे पर उखड़े थे..
मैने पूछा - "क्या हुआ?"
वो बोले - "क्या बताएँ साहब!
चार महीने से सीखा रहा हूँ
पूरा मुंह खोल - मैडम-मैडम बोल.
मुंह  पूरा खोलता ही नहीं 
मैं-मैं बोलता है, 'डम' बोलता ही नहीं!"
मैने कहा - "देशी है, हिन्दी बोलता है, अंग्रेजी क्यूं सिखलाते हो?"
वो बोले - " क्या फरक पड़ता है देशी हो, विदेशी हो?"
मैने पूछा - "क्या आप कांग्रेसी हो?"

एक साहब साहब सुबह-सुबह चिल्ला रहे थे
पानी न आने की वजह से झल्ला रहे थे
इसके पीछे आर एस एस का हाथ बतला रहे थे 
मैने कहा - "भाई ऐसे कामों मे साथ तो आपका ही होता है,
मुद्दा जो भी हो आमतौर पर 'हाथ' तो आपका ही होता है." 
साहब भडक कर बोले - "तुम कौन हो?
सी बी आइ लगवा दूंगा, बोलते कुछ बेसी हो"
मैने पुछा - "क्या आप कांग्रेसी हो?"

Sunday, August 14, 2011

गज़ल

फिर वही जलसे, वो हुज़ूम, वही हाकिमों के करतब हैं
हम फिर कुछ और नाचीज़, वो कुछ और हमारे रब हैं

खुद  को  इंसाँ  कहते है तो  जीभ  कट  सी  जाती है
हमारे  चूल्हों  के  मुद्दे  भी  उनकी दावतों के सबब हैं

हमसे और हाल-ए-जम्हुरियत न पूछ मेरे दोस्त 
दिल्ली  में  होते  आजकल  बस  गूंगे  तलब  हैं



Thursday, July 21, 2011

गज़ल

कोई उससे पूछे वो क्या चाह्ता है 
करके इतने सितम भी दुआ चाह्ता है.

मिटा दे वो हस्ती उफ भी न करें हम 
वो बेशर्त ऐसी वफा चाह्ता है.

तमाम जिस्म उसके जख्मों से छलनी
चारागर है, घायल से दवा चाह्ता है.

बददुआ भी दें तो किस तरह दें उसे  
सजदे किए थे कि खुदा हुआ चाह्ता है. 

ये दिल और दर्दों के कबिल नहीं अब 
जरा  आह भर के मिटा चाह्ता है. 

Friday, July 8, 2011

गज़ल

ये जो गफलतों के दरम्याँ कुछ नया- नया सा है 
ये क्या है जो कदमों तले कुछ आशमां सा है?  

ये जो मेरे साथ तूं है, जैसे कि देजा-वू है 
जो हो रहा है अब, जरा हुआ-हुआ सा है.

जो सोचता हूं, जैसे पहले हो चुका सा हो 
जो कह रहा हूँ सब जरा बयां-बयां सा है.

ये सब तेरा कमाल है या मेरा ख्याल है 
कुछ तो है कि बिन पिए नशा-नशा सा है.

गूंजते है फिजा में सजदे किसके नाम के 
असर है मेरे इल्म का कि तूं खुदा सा है?

Friday, July 1, 2011

गज़ल

तन्हाईयों का ज़हर है, जो अब जिन्दगी देता है 
अब हिज्र शुकूं देता है औ' दर्द खुशी देता है.

तेरे जाने की यादों का असर भी अजीब है 
इक उम्र रुलाया है, कुछ रोज से तसल्ली देता है. 

फिक्र-ओ-अरमां में कुछ इस कदर घुट गए थे
बर्बादियों का मंज़र भी अब संजीदगी देता है.

तेरे जहीन पेशों के कहाँ काबिल थे हम
ये हुनर अच्छा है, जरा आवारगी देता है.