Wednesday, December 9, 2009
बस इतना कि ....
दुनिया को कभी देखो...
"मीलों तक मेले हैं
मेलों में सहरा है
कितनी आवाजें हैं
चुप्पी का पहरा है। "
अब अल्फाज़ नही जुडते
ख्याल चूक गए हैं,
बातें हलक तक आ के सहम गई हैं.....
जाने किसको नाराज़ कर दें....
बस इतना कि
"ज़ख्म दिल पे लगे हैं
ख्यालों पे नहीं,
दर्द कोई शौक नहीं....
उदासी आदत भी नही..."
Monday, October 26, 2009
ग़ज़ल
सुबह की धूप पर लिख दी तूने शाम क्यूँ मौला?
तिनका-तिनका उड़ा गयीं सब ख्वाब सारे आशियाँ
अपनी ही हवाएं हो गयीं अंजान क्यूँ मौला?
हँसते-हँसते रो गए तो बात सारी खो गई
कहकहों को सिसकियों का अंजाम क्यूँ मौला?
अब तो आने थे फिजाओं में बहारों के ज़माने
अभी ये गुलशन को पतझड़ इनाम क्यूँ मौला?
Friday, October 16, 2009
चिराग
याद आए हैं तेरी आँखों के वो रौशन चिराग।
देख पल भर में ये आँखें नम सी कुछ पड़ जाएँगी
फ़िर दीयों की रौशनी मद्धम सी कुछ पड़ जायेगी
अब ये लौ की फडफडाहट गा भला क्या पायेगी
उठती झुकती पुतलियों के याद आए हैं वो राग।
जो तेरी गलियों में कटीं शामें मेरी कुछ बात थी
तेरी आंखों से थी रौशन जिंदगी कुछ बात थी
वो पटाखे, रौशनी, वो फुलझडी कुछ बात थी
फ़िर याद आए हैं पटाखों से जलाये थे जो हाथ।
याद आए हैं तेरी आंखों के वो रौशन चिराग।
Sunday, October 11, 2009
गुजरे ज़माने
आहों का असर है न अश्कों के ठिकाने
कहाँ हैं -कहाँ हैं वो गुजरे ज़माने ....
राहों पे जिनकी चली जिंदगी है
बातों पे जिनकी ढली जिंदगी है
अरसा हुआ है कि वो भी नहीं हैं
कि जिनसे निभाया, न आए निभाने।
इक उम्र गुजरी तेरे साथ आते
इक उम्र गुजरी ये रिश्ता निभाते
तुमसे तो जोड़े थे रूहों के नाते
तुम्हें भी तो अब हम पड़े हैं पुराने।
न आजमाओ साथी कि हुए अब ज़माने
कहाँ हैं- कहाँ हैं वो गुजरे ज़माने ।
Saturday, September 19, 2009
ग़ज़ल
वो आजकल स्याही में आंसू मिला के लिखता है।
अपनों से गैरों सा बर्ताव तो कोई बात नहीं
वो आजकल रुसवाइयों पे खुदा के लिखता है।
लफ्ज़ उठते हैं अक्सर जब सूख जाती हैं आँखें
और वो कहते हैं गम में मुस्कुरा के लिखता है।
कल तलक महसूस करता था फिज़ाओं में दर्द
अब सूरत-ए-हाल पे गज़लें बना के लिखता है।
Sunday, September 6, 2009
इक ग़ज़ल तेरे नाम.....
हम भी यूँ बैठे-बैठे क्या अजीब बात करते हैं
तुम तो सब भूल गए, हम हैं सब याद करते हैं।
किसी रोज़ किसी लम्हा कहीं छूट गए थे तुम
अब भी उसी लम्हे से ख़ुद को बेकरार करते हैं।
तुम भी तो तुम न रहे ज़माने की भीड़ में
ये हम तेरी राहों पे किसका इंतज़ार करते हैं?
कभी कहा था तुमसे कि एक तुम्ही हो मेरे दोस्त
आज जब तुम ही नहीं क्यूँ सब से ये बात कहते हैं?
Sunday, August 16, 2009
कभी.....
यूँ बिखरी भी हैं जुल्फें हवा के झोंके से कभी
हमने देखी है सहर शाम के झरोखे से कभी।
तेरे आने की आस लेकर गुजरे हैं कई ज़माने
इस जानिब भी आ जाओ बिना आहट के धोखे से कभी।
ये उदासी न पूछ बैठे कि उसके सिवा भी क्या है
ये दर्द-ए-दिल भी जाने कि तुम भी होते थे कभी।