Monday, January 12, 2015

बेखयाली

पूछोगी नहीं -
एक बार?
नज़र उठा देखा भी नहीं,
आंखें ही रोशन करतीं
सुबह तो होगी नहीं!

यही कि दिन तो न होने को था;
अब तक की रात काटी कैसे?
अंधेरे तो सांसों में हैं,
सियाहियाँ ख्याल बुनती थीं,
सिरफिरी उम्मिदों ने
बात काटी कैसे?

बस इतना कहना था
कि आशआर अब भी आते हैं -
उन्हीं तारीकियों के दर्मियाँ -
हाथ लागाता हूँ
तो हाथ लग भी जाते हैं,
बस रुकते नहीं -
तुम्हारी यादों के मानिंद -
आते हैं, चले जाते हैं।



Wednesday, October 8, 2014

ग़ज़ल

नुक्कड़-नुक्कड़, जलसे-जलसे यूं ही आते-जाते अक्सर
जाने कब कैसे आती हैं, किन बातों से वो बातें अक्सर।

सर्दी की सुबहों पर जब-जब फूंकों से बादल बुनता था
दिन ढ़लता था, फिर होती थीं आंखों से बरसातें अक्सर।

सोचा था मुद्दत बात मिलोगे, हैरां होगे, हाल तो लोगे
फिर सोचा कब पूरी होती हैं असल में सोची बातें अक्सर।

इन सूती धागों से अब सब जीवन की कडियाँ जोड़ तो लें
पर याद आती हैं ख्वाबों में रेशम की मुलाकातें अक्सर।

कुछ धुंधले अल्फाज़ कभी तो याद तुम्हें भी आयेंगे
बीते पर जानी जाती हैं सब शायर की सौगातें अक्सर। 




Saturday, September 13, 2014

गज़ल

ये खामोशियाँ कहे हैं, कोई तो बात हुई होगी
हक़ीक़त से कहीं हल्की सी मुलाकात हुई होगी।

अन्धेरों ही में पला है, उसे ड़रते तो नहीं देखा
चुपके से दिन ढ़ला होगा, चुपके रात हुई होगी।

कितने गहरे-गहरे ख्वाबों के दरख्त उजड़ गए
बड़ी जोर का तूफां था, बड़ी बरसात हुई होगी।

"या ऱब ज़माना मुझको मिटाता है किस लिए?"
ग़ालिब यही किस्सा तेरी भी हयात हुई होगी।

Wednesday, September 3, 2014

इश्क

अजीब इश्क है -
अपने शायर ही की तरह
रोटी से ख्वाब के निवाले लेता है,
तो जी लेता है। 




Monday, August 25, 2014

बेनाम

अब वो हुनर नहीं बाकी
कि तेरा नाम लूं औ' गज़ल हो जाए।

अब वो तूं भी नहीं, तेरा जुनूं भी नहीं
कि आंखों में नींद न हो
औ' ख्वाबों को बन्दिशें भी नहीं।

अब वो तसब्बुर भी नहीं
कि कायनात के दूसरे छोर से
तेरे मन-माफ़िक मेटाफ़र ढूंढ़ लाऊँ।

हां मगर बयां बाकी है -
तो तेरी खुश्बू में गुंथे कुछ खुरदरे ख्याल
जर्रे-जर्रे में बिखेर आया हूं।

कभी खुद को भूल पाने शिद्दत हो
या उड़ सकने के हौसले जुटा पाओ
तो सबसे अन्जान शै से अपना नाम पूछ लेना।

तूं एक शायर का बिछ्ड़ा हुआ इश्क़ है
कुछ सदियाँ तो नाम के सज़्दे होंगे।

Saturday, April 19, 2014

गज़ल

कुछ वस्ल में बातें न हुईं, कभी हिज़्र के लम्हे न हुए
अजीब इश्क़ था मेरा - यादों को भी किस्से न हुए।

वो इंतेहा-ए-इश्क कि रग-रग में घुल गई इबादत
वो जुनूं-ए-यार कि कभी ख़ुदा के भी सिज्दे न हुए।

बारहा दामन से लगे तो रहे, वो क्या थे, कि न थे?
वो यादें जो तेरी न गयीं, वो ख्वाब जो मेरे न हुए।

और कैसे ख्वाब? तुम्हारी परछायिंओं से बुनते गए
न परछायिंओं को शामें, ख्वाबों के भी सवेरे न हुए।


Friday, January 3, 2014

नज़्म

सोच के एक सिरे को पकड़ा,
सोचा इक ख्याल बुनूं -
जरा हल्के रंग का,
फिर जरा गाढ़े रंग का,
और फिर किसी और रंग का,
ऐसे दस बारह रंग-बिरंगे ख्याल जमा हों
तो उन्हें जोड़  इक नज़्म बनाउं -
कुछ तुम्हारी कैफ़ियत की मानिंद।

मगर इन सूती सोचों में तो गांठें पड़ती हैं,
ज़हन बेतरतीब ख्यालों में उलझ जाता है,
इन्हें जोडूं तो तो शायद खादी की कोई नज़्म बने -
हक़ीकत की तरह खुरदरी, बेरंग।

तुम यूं करो न!
जरा हाथ फेर दो इनपर
सब सोच के धागे रेशमी हो जाएँ,
सब ख्याल रंग-बिरंगे -
रेशम में सुना है गांठें नहीं पड़तीं,
औ' मेरी कारिगरी में जो कमी रहे
तुम्हारे रंगों में छुप जाए शायद!

Tuesday, October 22, 2013

गज़ल

तुम होते तो यक़ीनन न ये हिस्से में बयाबां होते 
मगर तुम भी मेरे होते तो तारीख का हिस्सा होते। 

स्याह होने से तो क्या उम्र ख्यालों की कम होगी 
तुम होते तो जरा रंग अशआर में जियादा होते।  

हमको तो रास आ गयीं गुमनामियां तुम्हारे बाद 
तुम भी तो अब इस भीड़ से जियादा कहां होगे? 

हमने तो अपनी इबादतों में ढूंढ़ लिया खुदको 
गर सुनते मेरी फ़रियाद, तुम भी तो खुदा होते। 


Wednesday, July 3, 2013

गज़ल

घुलीं जो सांस में, सांसों की वो कीमतें लगा गयीं
फिर हर्फ़-हर्फ़ उदासियां पूरी गज़ल पे छा गयीं।

हर बात सुनी सी है मगर, बेनाम सी आवाज़ है
किस गुमां में हमपर फ़िज़ा ये तोह्मतें लगा गई।

क्या खूब हमने जाना तुझे-ऐ इश्क़, तेरी जुस्तजू
संभले थे तो गिरा गई, गिरे तो फिर से उठा गई।

बस एक सूरत-ए-हाल पे तूं मत हमें बर्बाद कह
थीं बर्बादियां कि फिर हमें मुरीद खुद का बना गयीं।





Sunday, June 30, 2013

शायर की मौत

कैसी-कैसी बातें करता 
किस उलझन में जीता-मरता
हाथ बढाकर चांद खुरचता 
रंग सुनहले-ख्वाब वो गढ़ता। 

सहर से मांग लूं किरणें थोड़ी 
मिला पानी कुछ गूंथ लूं मिट्टी 
फिर लेप चांद के दाग मिटा दूं
जितना खुरचा उतना लौटा दूं। 

एक रोज कुछ भूल से उनसे 
दे बातों में तूल कि उनसे 
"तेरी आंखों से" - कह बैठा -
"सूरज जलता, चांद चमकता"। 

फिर ऐसा है चांद से नज़रें 
फेर के जाने वो बैठे हैं 
ड़ाल हक़ीकत के परदे 
ढ़क कर सहर को बैठे हैं। 

"एक कच्चा-पक्का शायर
कुछ आखिरी सांसों का मोह्ताज़ है तबसे"  


Thursday, June 13, 2013

गज़ल

अबके शायर को जरा जिंदगी की दवा दे मौला
हां ठीक कह्ता हूं अब ये हस्ती ही मिटा दे मौला।

रेशा-रेशा जल रहे हैं जान-ओ-दिल कब से कहूँ
ये खामखा की लौ - दे फूंक अब बुझा दे मौला।

ये जलती हुई आंखें, ये कश्मकश, ये ख्वाब न दे
अबके रात ढले तो गहरी नींद बस सुला दे मौला।

अब ये नज्में औ' न गज़लें औ' न ये जज्बात ही
अबके जिन्दा रख हमें तो दिल भी दुनिया सा दे मौला। 

Sunday, June 9, 2013

एक पुराना एहसास

इक ख्वाब जैसा फिर कोइ आने को है ....

जैसे खिड़कियों पर जाले लगे हों
धुआंधार बारिश से सहेजी हुई कुछ बूंदें
टिप-टिप टपकती हों,
और उनसे भी परे
कुछ झाड़ियां, कुछ अलसाए हुए बुढ़े से मकान
और एक बेतरतीब भीगा हुआ शहर;
सब एक धुन्धली तस्वीर के मानिंद आंखों के आगे पसरे हों।

और ये नादान मासूम आंखें
जाने कौन सी खूबसुरती तलाश लेंगी उनमें।

फिर ख्वाब टूटेगा,
अश्कों से बोझिल आंखें
चंद धुन्धली सी दिखती चीजों में पुराने एहसास तलाश
थक के सो जएँगी फिर।

हमने मासूमियत नहीं खोई
हमारा शहर खो गया है कहीं।


Saturday, April 27, 2013

शायर

एक-एक मुट्ठी मिट्टी कुरेदता -
अब अच्छी जगह बना ली  है उसने
चंद अरमान, कुछ दर्द, कुछ उफनते हुए जज्बात
सब समा जाएंगे इसमें।

बहुत खटकता था न आंखों में?
अब दफ़्न कर दो शायर को -
तसब्बुर की जमीं पर
गमों ने एक कब्र सी बना दी है
वहीं,
जो तमाम नज्में तुम्हारे नज्र की  थीं,
सब रख आना एक पोटली में बांध
और ड़ाल जाना उनपर
चन्द शिकायतें, कुछ नसीहतें
औ' शायद कुछ मजबूरियां भी।



Saturday, February 9, 2013

गज़ल!

न बस ज़ज्बात, इक फल्सफा सी तेरी सोह्बत है हमें
तेरी शोखियों से ज्यादा तेरी हस्ती से मोहब्बत है हमें।

बहुत होंगे कि तेरे अन्दाज पे वफा चाहने वाले तुझसे
तेरी नज़ाकत से अजीज मगर तेरी बगावत है हमें।

मुमकिन है किसी रोज वो खुदा भी कह दें तुमको
जो है तुझसे, इंसान की इन्सां से अकीदत है हमें।

औ' तेरे इश्क में हो जाएं फ़रिश्ता, ये इम्कां भी नहीं
हाँ मगर तुझसे सुलझी सी, मुमकिन सी चाहत है हमें।


Tuesday, February 5, 2013

बात

आ कि फिर जिन्दगी की बात करें
खालिस जिन्दगी - भूखी, अधनंगी।

तारीकियां जो पिघलने लगी  हैं
नर्म ख्वाबों के नादां उजालों में
सहेज लो उनको -
काली स्याही में मिला उनसे
गाढ़े रंग की हकीकत लिखी जाएगी।

जुबां पर जो कड़वा जायका है
इश्क की खामखा मिठास से फीका पड़ने लगा है
बचा लो उसको -
बेबाकियत मीठी पड गयी
तो अल्फाज़ असर खो देंगे।





Saturday, January 19, 2013

सुन बावरी!

सुन बावरी!
सब एक हैं - ये धूप भी और छांह भी
इस भेद का ये भेद है
जो है खुशी सो खेद है
जो है हंसी सो आह भी।

सुन बावरी!
इस खेल की ये रीत है
ये रंग सब खो जाएंगे
तब एक रंग हो जाएंगे
सब जीत भी और हार भी।

सुन बावरी!
अब छूट जाने दे हमें
तेरी राह के हैं मिथक भर
अब टूट जाने दे हमें
ले नफरतें और प्यार भी।

सुन बावरी .....

Tuesday, December 11, 2012

गज़ल

बाद मुद्दत के इक खयाल फिर अपना लगा
जाने क्यों उदास होना भी आज अच्छा लगा।

ज़हन रु-ब-रु नाकामियों से परेशान होता था
दिल खामखा कुछ जिन्दा लगा, ताजा लगा।


तेरे एहसास की बारीकियाँ क्या समझा किए
जब टूट गया तब अनमोल तेरा वादा लगा।

तूने बख्शी है इक उम्र तसल्ली दिल को
बाद रूख्सत के कोइ नेमत तेरा आना लगा।

तूं 'अक्स' की इन गज़लों का मतलब न पूछ
तुझसे लगा, जब भी अशआर का मज़मा लगा।






  

Friday, November 16, 2012

ग़ज़ल


हमारे बस सफ़र से ही क़ायदे कुछ भंग होते हैं 
यहाँ पर हर कदम रस्ते जरा और तंग होते हैं। 

सियासी मसलों पे इस कदर न बेबाक हुआ कर 
दर्मयाँ अंधेरों-उजालों के यहाँ कई रंग होते हैं।

यहाँ सब फासले बस मंच की रवायतें भर हैं
हो नेपथ्य तो सब एक दूसरे के संग होते हैं। 

दरवाजों के सुरों से ही क्यूँ तूं बावरा है 'अक्स'
इस घर में दीवारों के भी अपने आहंग होते हैं। 

Friday, October 19, 2012

गज़ल

यूं बेकरारियां बज्मों में सरेआम सबसे कहा  न कर
तूं  तो मेरी अपनी है गज़ल, तूं  तो हमें रुस्वा न कर।

इस अंदाज पर सब तेरे कायल तो हो जाएंगे मगर
आ कहेंगे मुझसे फिर कि बातें तूं ऐसी किया न कर।

ये लोग कब समझेंगे भला तेरे दर्द की बारीकियाँ
रौशनी के पुतलों पे अपनी तारीकियाँ ज़ाया न कर।

जिसे भी ज़ख्म दिखाओ उसी को चारागरी का शौक नहीं
दुआ ही कर जालिम,  तूं बेशक भले दवा न कर।



Wednesday, September 26, 2012

गज़ल

अल्फाज़ जोड़ रखूं मगर, कुछ हाल-ए-दिल बयां तो हो
कहो तो फिर गज़ल कहूँ, पर कहूँ तो कुछ नया तो हो।

ज़हीन  तो  क्या  खाक  थे,  शायर  भी  अब कहाँ रहे
जो  महफिलों  में  हम कहें, जो कुछ न हो खरा तो हो।


हकीकतों  में तुम  तो  अब खबर हमारी लोगे क्या
इक ख्वाब छोड़ जाओ बस, साँसों को कुछ वजह तो हो।

ज़माने से तो लड़ भी लें, पर दोस्त तेरी खामशी?
खुशी से जो न मिल सको, कुछ रु-ब-रु गिला तो हो।

जिन्दगी तो 'अक्स' अब, बिगाड़ तेरा लेगी क्या
लुटे जो कुछ जमा भी हो, मिटे जो कुछ रहा तो हो।