Tuesday, October 22, 2013

गज़ल

तुम होते तो यक़ीनन न ये हिस्से में बयाबां होते 
मगर तुम भी मेरे होते तो तारीख का हिस्सा होते। 

स्याह होने से तो क्या उम्र ख्यालों की कम होगी 
तुम होते तो जरा रंग अशआर में जियादा होते।  

हमको तो रास आ गयीं गुमनामियां तुम्हारे बाद 
तुम भी तो अब इस भीड़ से जियादा कहां होगे? 

हमने तो अपनी इबादतों में ढूंढ़ लिया खुदको 
गर सुनते मेरी फ़रियाद, तुम भी तो खुदा होते। 


Wednesday, July 3, 2013

गज़ल

घुलीं जो सांस में, सांसों की वो कीमतें लगा गयीं
फिर हर्फ़-हर्फ़ उदासियां पूरी गज़ल पे छा गयीं।

हर बात सुनी सी है मगर, बेनाम सी आवाज़ है
किस गुमां में हमपर फ़िज़ा ये तोह्मतें लगा गई।

क्या खूब हमने जाना तुझे-ऐ इश्क़, तेरी जुस्तजू
संभले थे तो गिरा गई, गिरे तो फिर से उठा गई।

बस एक सूरत-ए-हाल पे तूं मत हमें बर्बाद कह
थीं बर्बादियां कि फिर हमें मुरीद खुद का बना गयीं।





Sunday, June 30, 2013

शायर की मौत

कैसी-कैसी बातें करता 
किस उलझन में जीता-मरता
हाथ बढाकर चांद खुरचता 
रंग सुनहले-ख्वाब वो गढ़ता। 

सहर से मांग लूं किरणें थोड़ी 
मिला पानी कुछ गूंथ लूं मिट्टी 
फिर लेप चांद के दाग मिटा दूं
जितना खुरचा उतना लौटा दूं। 

एक रोज कुछ भूल से उनसे 
दे बातों में तूल कि उनसे 
"तेरी आंखों से" - कह बैठा -
"सूरज जलता, चांद चमकता"। 

फिर ऐसा है चांद से नज़रें 
फेर के जाने वो बैठे हैं 
ड़ाल हक़ीकत के परदे 
ढ़क कर सहर को बैठे हैं। 

"एक कच्चा-पक्का शायर
कुछ आखिरी सांसों का मोह्ताज़ है तबसे"  


Thursday, June 13, 2013

गज़ल

अबके शायर को जरा जिंदगी की दवा दे मौला
हां ठीक कह्ता हूं अब ये हस्ती ही मिटा दे मौला।

रेशा-रेशा जल रहे हैं जान-ओ-दिल कब से कहूँ
ये खामखा की लौ - दे फूंक अब बुझा दे मौला।

ये जलती हुई आंखें, ये कश्मकश, ये ख्वाब न दे
अबके रात ढले तो गहरी नींद बस सुला दे मौला।

अब ये नज्में औ' न गज़लें औ' न ये जज्बात ही
अबके जिन्दा रख हमें तो दिल भी दुनिया सा दे मौला। 

Sunday, June 9, 2013

एक पुराना एहसास

इक ख्वाब जैसा फिर कोइ आने को है ....

जैसे खिड़कियों पर जाले लगे हों
धुआंधार बारिश से सहेजी हुई कुछ बूंदें
टिप-टिप टपकती हों,
और उनसे भी परे
कुछ झाड़ियां, कुछ अलसाए हुए बुढ़े से मकान
और एक बेतरतीब भीगा हुआ शहर;
सब एक धुन्धली तस्वीर के मानिंद आंखों के आगे पसरे हों।

और ये नादान मासूम आंखें
जाने कौन सी खूबसुरती तलाश लेंगी उनमें।

फिर ख्वाब टूटेगा,
अश्कों से बोझिल आंखें
चंद धुन्धली सी दिखती चीजों में पुराने एहसास तलाश
थक के सो जएँगी फिर।

हमने मासूमियत नहीं खोई
हमारा शहर खो गया है कहीं।


Saturday, April 27, 2013

शायर

एक-एक मुट्ठी मिट्टी कुरेदता -
अब अच्छी जगह बना ली  है उसने
चंद अरमान, कुछ दर्द, कुछ उफनते हुए जज्बात
सब समा जाएंगे इसमें।

बहुत खटकता था न आंखों में?
अब दफ़्न कर दो शायर को -
तसब्बुर की जमीं पर
गमों ने एक कब्र सी बना दी है
वहीं,
जो तमाम नज्में तुम्हारे नज्र की  थीं,
सब रख आना एक पोटली में बांध
और ड़ाल जाना उनपर
चन्द शिकायतें, कुछ नसीहतें
औ' शायद कुछ मजबूरियां भी।



Saturday, February 9, 2013

आखिरी सी गज़ल

न बस ज़ज्बात, इक फल्सफा सी तेरी सोह्बत है हमें
तेरी शोखियों से ज्यादा तेरी हस्ती से मोहब्बत है हमें।

बहुत होंगे कि तेरे अन्दाज पे वफा चाहने वाले तुझसे
तेरी नज़ाकत से अजीज मगर तेरी बगावत है हमें।

मुमकिन है किसी रोज वो खुदा भी कह दें तुमको
जो है तुझसे, इंसान की इन्सां से अकीदत है हमें।

औ' तेरे इश्क में हो जाएं फ़रिश्ता, ये इम्कां भी नहीं
हाँ मगर तुझसे सुलझी सी, मुमकिन सी चाहत है हमें।


Tuesday, February 5, 2013

बात

आ कि फिर जिन्दगी की बात करें
खालिस जिन्दगी - भूखी, अधनंगी।

तारीकियां जो पिघलने लगी  हैं
नर्म ख्वाबों के नादां उजालों में
सहेज लो उनको -
काली स्याही में मिला उनसे
गाढ़े रंग की हकीकत लिखी जाएगी।

जुबां पर जो कड़वा जायका है
इश्क की खामखा मिठास से फीका पड़ने लगा है
बचा लो उसको -
बेबाकियत मीठी पड गयी
तो अल्फाज़ असर खो देंगे।





Saturday, January 19, 2013

सुन बावरी!

सुन बावरी!
सब एक हैं - ये धूप भी और छांह भी
इस भेद का ये भेद है
जो है खुशी सो खेद है
जो है हंसी सो आह भी।

सुन बावरी!
इस खेल की ये रीत है
ये रंग सब खो जाएंगे
तब एक रंग हो जाएंगे
सब जीत भी और हार भी।

सुन बावरी!
अब छूट जाने दे हमें
तेरी राह के हैं मिथक भर
अब टूट जाने दे हमें
ले नफरतें और प्यार भी।

सुन बावरी .....