Saturday, January 29, 2011

त्रिवेणियाँ

किसी ने पूछा था हँस के कि कैसे हो तुम?
यूँ ही हँस के जवाब मिला  "अच्छा ही हूँ",

झूठी हंसी में सूखे हलक छिल न गए हों कहीं|


"दिल्ली आने वाली है, नाक ढक लो" किसी ने कहा
रेल  किसी  नाले के  ऊपर से  गुजरी  थी  शायद

कल इलाहाबाद में तो कैसी बलखाती सी मिली थी यमुना|


कल फिर उसे मुद्दतों बाद दोस्ती याद आयी
सोचा कि अच्छा है फिर साथ हो लें हम,

जिंदगी! तुझे बैशाखियों कि जरुरत तो नहीं?


कितनी कशमकश है मंजिलों की आजकल
भागता रहता हूँ, साँसें फूल जाती हैं

यूँ हम मेहमां हैं, दुनियां हमारा घर तो नहीं?


हवाएं तेज थीं, टूटी हुई पतंग को  आश्मां निगल गया
वो उदास बैठा देखता है काँटों में उलझे हुए रेशमी धागे

न कहा था? रेशम के धागों से हसीं ख्वाब न उडाया करो...

याद  है कितनी  बरसात हुई थी शहर में, जिस  रोज  तुम जाने वाले थे 
घुटने तक पानी मे खडे मुस्कुराती आँखों से विदा किया था एक दुजे को 

किसे मालूम है कि बारिश में आँसुओं का नमकीन स्वाद भी घुल गया था

ज़ख्म औ' जिस्म एकरंग हो गए हैं, अब पह्चाने नहीं जाते
कुछ रोज से ख्यालों को तलाश है, अल्फाज़ मिलते ही नहीं

स्याहियों ने जिन्दगी से दोस्ती कर ली है, कागज़ पर नहीं उतरतीं..


जलती दोपहर की कुछ किरनें बटोर पोटली मे बांध रख लिया कर
अमावस की रातों को गीली मिट्टी में गूंथ उससे चांद गढ़ा करेंगे

तूं जो इक उम्र जला है, कभी  सारे आलम के अन्धेरे रोशन होंगे.

 कुछ दर्द रंग खोने लगे थे, तल्खियाँ कुछ बहलने सी लगी थीं
सोचता था कोई मेटाफर मिले तो इन खुदरा गमों की साख रहे 

जिन्दगी, वही जिन्दगी, एकबारगी फिर से रु-ब-रु आ खडी हुई



वो जो कभी खुदा ही के मानिंद समझता था हमें 
कल मिला तो बस इक फीकी सी मुस्कान लिए गुज़र गया 

यूं भी अब मंदिरों के आगे सर नवा के गुज़रने की रस्म कहाँ

जिन्दगी ने कुछ अदब ही से पूछा था उस रोज हमें
हमी  ने रूखाई से कहा था "तेरा भरोसा क्या?"

माँ की आदत पडी है, हर बार दुबारा पूछ लेती है...

वो उभरते हुए नैन-नक्श, वही अदा, वो शोखियाँ 
हरेक शेर में जैसे बिखरे हों तेरे ही चर्चे तमाम 

मैं सोचता हूँ कि गालिब तुमसे कब मिले थे आखिर?

इस बार छत से वो पहाड नहीं दिखा जो बचपन में दिखा करता था
मजदूर बच्चों के शोर से एहसास हुआ बिल्डिंग तकरीबन बन चुकी थी

मुझको यकीं है इस शहर के लोग अब अमीर हो गए हैं....

कई  बार कोशिश की है कि लफ्जों में तेरा कोई 'स्केच' बुना जाए
बैठता हूँ तेरी तस्वीर के रु-ब-रु कि खामखा अल्फाज़ फीके हो जाते हैं

अजीब जिद है काली-नीली स्याही में तेरी सतरंगी कैफियत समाएगी भला?


पूछ्ते हो क्युं  अपनी ही अपनी बात करता हूँ
अजीब इन्सान हूँ अपनी ही तारीफ के कसीदे गढ़ता हूँ

कैसे बताऊँ तुम आए थे तो कितनी मुद्दत पे अपनी याद आयी थी  हमें।


ये बेतकल्लुफ मिजाज़, ये अदा, ये रेशमी अन्दाज तेरे
कोइ इम्कां तो नहीं कि अल्फाज़ में सिमट जाएँ

आ कि चंद शेर फिर से बर्बाद करुं तुझ पर।


जिन आंखों में चांद सा चेहरा बसा था तुम्हारा, सुजा ली हैं हमने
सुबह से रिसती रही हैं बूंदें कुछ, शाम छत पे सजा आउंगा

तुम्हीं कहते थे, चांद असल में कौन सजा पाया है ज़मीं पर अब तक।


या तूं मिले तो उमर भर उसकी इबादतों का सबब हो
या कि तेरे गम में शायद मर ही जाएँ हम

तेरे इश्क में तूं न सही, खुदा के करीब हो जाएंगे।

न भूल पाता हूं तुम्हें, न याद करने की इजाज़त है
सांस चली हो सीने से, हलक में आ फंसी हो जैसे 

इक जरा थपकी ही दे जाओ कभी तो करार आये।



Thursday, January 20, 2011

ग़ज़ल

अपने ही घर में चीजें अनजानी सी पड़ गयी हैं
पुराना मकान है अब दरारें सी पड़ गयी हैं

अब और आह का सबब क्या बताएं हम
बात अब तुझको भी बतानी सी पड़ गयी है

रिश्तों पर जमी धूल देखी तो याद आया
कुछ रोज़ से कुछ चीजें पुरानी सी पड़ गयी हैं.

आजकल करीबी लोग भी साफ़ नहीं दिखते
खरोंच आई है, चश्मे पे निशानी सी पड़ गयी है.

Saturday, January 15, 2011

ग़ज़ल

कहाँ हैं अब, वो तुम, वो मैं, वो शाम वो किस्से
किन्हीं वजहों से सारे शहर में बदनाम वो किस्से

वो नुक्कड़ पे जमने वाली रोज़ की महफ़िलें
आवारगी का, गर्दिशों का अंजाम वो किस्से.

वो जाड़े की सुबह, वो अलाव, वो हिंदी अख़बार
चाय पे सियासत के चर्चों के नाम वो किस्से.

जिंदगी को देखने के नज़रिए ही बदल गए
न वो फुर्सत, न शुकूं, न सर-ए-आम वो किस्से.

Sunday, January 9, 2011

ग़ज़ल

बना के हसीं दर्द-ए-दिल नज्मों में उतारे थे कभी
इतनी खुशरंग थीं ये दिल कि दरारें भी कभी.

किसकी साजिश है कि पसरे हैं बेरूह अँधेरे
अपने सजदों में असर था कि उजाले थे कभी.

इतना नाआशना होकर भी न गुज़रो लोगों
इसी शहर में चर्चे थे हमारे भी कभी.

ठंडी राख को हकीकत समझ बैठे हो
जानोगे 'गर देखोगे जलने के नज़ारे भी कभी.